काफल पाको मिन नि चाखो... (उत्तराखंडी लोक कथा)

- डॉ. राजेश्वर उनियाल
(बंधुओ, मैंने कुछ दिन पहले इसी लोक कथा को अपनी उत्तराखंडी भाषा में प्रस्तुत किया था, परंतु मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि वे भाषा की अनभिज्ञता के कारण इस लोक कथा का पूरा आनंद नहीं उठा पाये । इसलिए मैं उस कथा को पुनः हिंदी में प्रस्तुत कर रहा हूँ, ताकि इसका सभी आनंद उठा सकें) -
बहुत पहले की बात है, तब उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में यातायात की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी । यातायात का साधन सामान्यतः पैदल ही होता था तथा परिवहन का काम घोड़ों, खच्चरों व भेड़ आदि से कराया जाता था । तब वहां अधिकतर तीर्थयात्री व सन्यास लेने हेतु सन्यासी आदि ही आते थे । हाँ कभी-कभी केवल कुछ घुमक्कड़ प्रवृति के लोग या अपनी जिज्ञासा को शांत करने हेतु यदा-कदा पर्यटक तथा प्रकृति प्रेमी अवश्य आते थे । इसके साथ ही विभिन्न विषयों विशेषकर वनस्पतीय पदार्थों पर शोध करने हेतु शोधार्थी व व्यवसायी भी आते रहते थे । तब वहां के लोगों के पास आय का कोई विशेष साधन नहीं होता था लेकिन तब मनुष्यों की आवश्यकताएं भी बहुत सीमित हुआ करती थी । खाने के लिए खेतों में अनाज व सब्जियां हो जाया करती थी तथा वनों से फल व लकड़ियां भी पर्याप्त मिल जाते थे । यहां के लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन पर आधारित था । शिवालिक पहाड़ियों के लोग दुग्ध उत्पादन हेतु गाय भैंस पर निर्भर थे, तो हिमालयीन क्षेत्रों के लोग भेड़ बकरी पालन कर उनका व्यवसाय किया करते थे । उच्च पहाड़ी क्षेत्रों के गांवों में बसे हुए लोगों का तिब्बत के व्यापारियों के साथ वस्तु विनिमय होता था । तिब्बत के व्यापारी जो कि सामान्यतः भोटिया प्रजाति के लोग होते हैं, वह अपने साथ हींग और अन्य सुगंधित वनस्पतीय पदार्थ लेकर आते थे तथा यहां से अनाज व दालें आदि लेकर जाते थे । पुरुष लोग अधिकतर पशुपालन आदि के व्यवसाय में बाहर जाया करते थे तथा महिलाएं घर एवं खेती कार्यों के साथ ही जानवरों के लिए घास तथा चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी आदि लेने के लिए वन जाया करती थी ।
इसी तरह से एक पहाड़ी गांव में एक साधारण-सा गरीब परिवार अपना जीवन निर्वाह करता था । उस परिवार में एक पति-पत्नी तथा उनकी एक बेटी थी । पति अक्सर खच्चर में सामान ढोने का काम करता था तथा पत्नी घर की देखभाल किया करती थी । हालांकि उनका पूरा वर्ष सामान्य रूप से बीत जाता था, लेकिन उनकी असली आय गर्मियों के माह में ही अधिक हुआ करती थी । दरअसल गर्मियों में श्रीबद्रीनाथ एवं केदारनाथ की यात्रा के लिए तीर्थयात्री आते रहते थे । उस दौरान वह अपने खच्चर लेकर तीर्थयात्रियों को यात्रा कराने का काम करता था तथा उसकी पत्नी जंगल से काफल तोड़कर लाती थी और रास्ते में तीर्थयात्रियों को काफल बेचकर धन जमा करती थी । इस आमदनी को दोनों पति-पत्नी अपनी इकलौती बेटी के विवाह के लिए बचाकर रखते थे । हालांकि बेटी अभी बहुत छोटी थी, लेकिन अभी से बचत करना प्रारंभ करेंगे, तो तभी तो उसका विवाह वहां की परंपरा के अनुसार धूमधाम से कर सकेंगे ।
लेकिन उनकी बेटी की नजर तो बस काफल से भरी हुई टोकरी पर ही लगी रहती थी । मां प्रतिदिन काफल तोड़कर लाती और मार्ग में आते-जाते तीर्थयात्रियों को बेचती और जो काफल टोकरी में बच जाते थे, वह उन्हें खाने के लिए अपनी बेटी को देती थी । उनकी बेटी लाल-लाल रसदार काफलों को चटकारे मार-मार कर खाया करती थी ।
पहाड़ों में गर्मी का मौसम आते ही वहां के जंगलों में काफल के फल प्राकृतिक रूप से फलते हैं । यह फल पहाड़ों में ऊंचाई स्थित ठंडे क्षेत्रों के पेड़ों में लाल रंग की बेरनुमा आकार के गुच्छों में पकते हैं । इसका बाहरी भाग रसीला होता है, जिसे कि हम दांतों के नीचे दबाकर चूसते हैं तथा अंदर की गुठलियां चूसकर बाहर फेंक दी जाती हैं । इन फलों में जहां कई सारे औषधीय तत्व पाए जाते हैं, वहीं इनकी सबसे बड़ी कमी है कि ये अधिक देर तक टिक नहीं पाते हैं । यह सूखकर रसहीन हो जाते हैं, इसलिए इनका कोई उपयोग नहीं होता है । इसीलिए इनको तोड़कर शीघ्र ही बाजार में बेचने हेतु ले जाया जाता है । हालांकि अब इनका प्रसंस्करण कर इनका काफल जूस एवं कई अन्य पदार्थ भी बनाए जाते हैं । लेकिन कुछ दशक पहले तक यह फल केवल तुरंत खाने योग्य ही होते थे ।
काफल के नाम से भी भ्रम हो जाता है । कहा जाता है कि एक बार एक आदमी सड़क के किनारे काफल बेच रहा था । उधर से एक अंग्रेज पर्यटक आया तो जब उसने टोकरी में लाल-लाल रसदार फल देखे, तो उसका मन उन्हें खाने के लिए ललचाया । वैसे भी दोपहर की भरी धूप खिली हुई थी । उसने उस फल का नाम जानने हेतु अपनी टूटी-फूटी हिंदी में काफल वाले से पूछा कि यह का फल है । काफल वाले ने जवाब दिया - जी हां यह काफल है । यह सुनकर अंग्रेज को बहुत खराब लगा । उसने सोचा कि यह मेरा मजाक उड़ा रहा है । उसने राह चलते दूसरे व्यक्ति से पूछा - ओ मिस्टर, बताओ टोकरी में का फल है । उस व्यक्ति ने भी उत्तर में कहा कि हां साब, यह काफल है । अब अंग्रेज का पारा चढ़ गया । उसे लगा कि यहां के लोग पर्यटकों के साथ ऐसा ही मजाक करते होंगे । उसने गुस्से में कहा कि अच्छा हमको बताओ कि इसे खाते कैसे हैं । उस व्यक्ति ने कहा कि साब गुस्सा मत कीजिए और इसके चार दाने मुंह में रखकर दांतों से दबाइए । उस अंग्रेज़ ने काफल वाले से चार दान लिए और मुंह में रखकर जैसे ही दांतों से दबाया तो उसका एक दांत तड़ाक से टूट गया । इससे वह अंग्रेज आगबबूला हो गया और उसने चिल्लाते हुए कहा – ओह यह का फल है । उस व्यक्ति ने बड़े भोलेपन से कहा कि हाँ साब, जब आपका दांत टूट गया, तब आपको पता चला कि यह काफल है, जबकि हम पहले से कह रहे हैं कि यह काफल है ।
वह दंपति अपनी दिनचर्या नियमित रूप से बिता रहे थे, पर होई वही जो राम रचि राखा । एक दिन की बात है, उसका पति जब तीर्थयात्रियों को लेकर यात्रा के लिए जा रहा था, तो एक पहाड़ी मोड़ पर उसका खच्चर लड़खड़ा गया । उसने उस यात्री को तो जैसे-तैसे बचा लिया, परंतु वह अपने ही खच्चर से टकराने के कारण सीधे नीचे खाई में गिर गया, जिस कारण से उसका देहांत हो गया । अब पति की मृत्यु के बाद उस महिला के पास आय का साधन केवल काफल बेचना ही रह गया था । वह पूरे वर्ष जैसे-तैसे लकड़ियां काटकर और लोगों के खेतों में मजदूरी करके अपना और अपनी बेटी का पेट पाल रही थी, लेकिन गर्मियों के मौसम में वह रोज सवेरे जंगल जाकर एक टोकरी में काफल भरकर लाती और दोपहर में उन्हें बाजार में जाकर बेच आती थी । अब क्योंकि उसके घर की आय का एकमेव साधन केवल काफल बेचना ही रह गया था, इसलिए अब वह अपनी बेटी को काफल खाने के लिए कम ही दिया करती थी । धीरे-धीरे समय बीत गया, बेटी जवान होने लगी तथा उसके अंदर भी बुढ़ापा छाने लगा था ।
एक दिन वह बुढ़िया प्रतिदिन की तरह सवेरे जंगल में काफल तोड़ने गई, लेकिन वहां से लौटते हुए उसे कुछ देरी हो गई । अब घर पहुंचकर उसने सोचा कि यदि मैं अभी इन काफलों को बेचने जाऊंगी तो वापस आते-आते रात हो जाएगी और फिर जानवरों के लिए जंगल से चारा लाने का वक्त नहीं रहेगा । इसलिए अभी मैं इनका फलों को घर में संभाल कर रख देती हूं और बाद में आकर इन्हें बेच दूंगी । ठीक है, ऐसा ही करती हूं । यह सोचकर वह बुढ़िया अपने घर पहुंची और उसने अपनी बेटी को समझाते हुए कहा कि बेटी मैं इन काफलों को लाई हूं । तू इन्हें संभालकर रखना और इनकी देखभाल करते रहना । अभी मैं फिर से जंगल जाकर पहले जानवरों के लिए घास लेकर आती हूं । लेकिन हां ! तू बड़ी चटोरी है और काफल देखकर तेरी लार टपकती रहती है, इसलिए ध्यान रखना और इसका एक दाना भी मत खाना । बेटी, अब हमारे जीवनयापन के लिए और तेरे विवाह के लिए बस, यही तो एक आधार है । एक बार तेरा विवाह हो जाए, तो फिर जब तू मायके में आकर जितना कहेगी, मैं तुझे काफल खिलाती रहूंगी । बस आज मेरी बात मान जाना । ठीक है ।
बेटी को समझाकर और बेटी पर पूरा भरोसा करके वह बुढ़िया फिर से जंगल को चली गई । अब क्योंकि गर्मियों के दिन थे और गर्मियों की दोपहर में सूरज की तपन बढ़ने के कारण काफल भी सूख जाते हैं, इसलिए टोकरी में रखे हुए काफल भी सूख गए और जो टोकरी काफलों से पूरी भरी हुई थी, अब वह सूख जाने के कारण आधी के आसपास हो गई थी ।
कुछ देर बाद जब वह बुढ़िया जंगल से घर लौटी तो वह यह देखकर चौंक गई कि उसकी टोकरी केवल आधी हो गई है । इसका मतलब उसकी बेटी ने अपनी मां की बातों पर ध्यान देने के बजाय आधे काफल खा लिए । कहां है बेटी ! अभी देखती हूं । यह बड़बड़ाते हुए वह अंदर गई तो उसने देखा कि उसकी बेटी गहरी नींद में सोई हुई थी । बुढ़िया को गुस्सा तो आना ही था, एक तो सुबह से भूखी प्यासी, दूसरा दो-दो बार जंगल से काफल और घास काटकर लाना कोई मजाक थोड़ी ना था । उस पर उसकी बेटी, जिसके लिए उसने अपना सर्वस्व निछावर कर दिया, उसने उसकी बात नहीं मानी । आज ठीक करती हूं और गुस्से में आकर उसने वहीं पास में रखा हुआ एक डंडा उठाया और सोई हुई बेटी पर जोर से मार दिया । एक तो बेटी सोई हुई, दूसरी नाजुक-सी कली, भला गुस्से में भरी हुई मां के हाथ से लाठी की मार कैसे सह पाती और थोड़ी ही देर में उसके प्राण पखेरू हो गए । अब बेटी को मरा हुआ देखकर मां भी बेसुध हो गई और वह भी वहीं जमीन पर गिर गई ।
धीरे-धीरे शाम हो गई और अंधेरा छाने लगा । प्रकृति तो अपने नियमों से ही चलती चलती है । जब बुढ़िया को सुध आई तब तक रात का अंधेरा छाने लगा था । उसने सोचा कि अब कल सुबह ही मैं गांव वालों को बुलाकर बेटी का दाह संस्कार करूंगी । यह सोचकर बुढ़िया अपनी बेटी की मृतदेह के पास पड़ी हुई रोती रही ।
सुबह की लालिमा जैसे-जैसे बढ़ने लगी, वैसे-वैसे गांव के लोगों का आना प्रारंभ हो गया । लोगों ने देखा कि बाहर आंगन में काफल की टोकरी काफलों से भरी हुई है । जब उन्होंने यह बात उस बुढ़िया को बताई तो बुढ़िया को अपनी गलती का पश्चाताप हुआ । वह समझ गई कि कल दोपहर की धूप में सूखने के कारण काफल कम हो गए थे, जबकि रात की शीतलता के कारण काफल फिर से अपने असली रूप में आ गए और टोकरी काफलों से भर गई । अरे ! यह मैंने क्या कर दिया ? मैंने अपने ही हाथों से अपनी लाडली को मार दिया ! अब मुझे भी जीने का क्या अधिकार है और यह सोचते हुए उसने अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर दी । गांव वालों ने दोनों मां बेटी का अंतिम संस्कार कर उन्हें इस संसार से विदा कर दिया ।
लेकिन ईश्वर की लीला कुछ और ही होती है । स्वर्ग में विराजित मां पार्वती ने यह देखते हुए भगवान शिव से कहा कि भोलेनाथ यह तो निर्दोष बालिका थी, जिसने मां की बात को मानते हुए काफल नहीं खाए और निर्दोष ही मारी गई तो क्या उसकी मां कभी अपनी बेटी को बता पाएगी कि नहीं बेटी, तूने काफल नहीं खाए, वह तो मुझसे गलती हुई थी । भगवान शिव ने मंद मंद मुस्कराते हुए कहा कि नहीं, प्रतिवर्ष जब भी वसंत का मौसम आएगा यह दोनों मां बेटियां चिड़िया के रूप में वन में विचरण करेंगी और जब काफल पकेंगे तो बेटी चिड़िया अपनी मां से पूछेगी कि माँ मैंने काफल नहीं खाए तो मां उसको कहेगी कि हां बेटी मुझे पता है, तूने काफल नहीं खाया ।
बस तभी से पहाड़ों में यह लोककथा प्रचलित हो गई है कि जब ग्रीष्म का महीना आता है और वृक्षों में काफल पकने प्रारंभ होते हैं, तो नन्ही चिड़िया ड़र के मारे अपनी मां से कहती है कि मां “काफल पाको मिन नि चाखो”, अर्थात माँ काफल पक गए हैं, लेकिन मैंने अभी तक चखे भी नहीं हैं । इस पर उसकी मां उसे सांत्वना देते हुए जवाब देती है कि – “पुर्रे पुतई पुर्र पुर्र” अर्थात हां बेटी, मुझे पता है कि तूने काफल नहीं खाया - पूरे हैं बेटी पूरे हैं ।
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- डॉ. राजेश्वर उनियाल